मेरी अय्याशियों में महफ़िलें हैं मेरी अय्याशियों में महफ़िलें हैं कि इक कमरे में चन्द जमा तो जुदा हो जाएँ मेरी अय्याशियों में महफ़िलें हैं कि चन्द लम्हे वास्ते खुद को भूल दें , तो शायद खुदा हो जाएँ लोग अक्सर खर्च खूब करते हैं, "फ़िज़ूल" फ़िज़ूल दौलत, फ़िज़ूल शौहरत मगर फ़िज़ूल वक़्त, यही खर्च नहीं होता अजब इस फ़िज़ूल ज़िन्दगी में, इक लम्हा फ़िज़ूल नहीं होता मेरी अय्याशियों में महफ़िलें हैं जहां लम्हे खर्च हों, तो फ़िज़ूल नहीं जाते कहीं ख़ुशी ढूंढ लेती हैं किसे, कहीं नए मरासिम है बन जाते' मेरी अय्याशियों में महफ़िलें हैं महफ़िलों में इक नशा है जो रफ्ता रफ्ता असर भरता है जब चन्द मिलते हैं, मुस्कुराते हैं कुछ सुनते हैं, सुनाते हैं इन महफ़िलों में कोई धोखा नहीं है यहाँ बातों का कोई और मतलब, मक्सद नहीं होता मतलब, मक़्सद एक ~ "खुशी" यहाँ आँखों की रौशनी रँगत भरती है यहाँ जब होंठ मुस्कुराते हैं, तो तबीयत भरती है गर खर्च करना ही है, तो वक़्त करो "फ़िज़ूल" इन लोगों में, इन लम्हों में कि यह खर्च आज फ़िज़ूल, कल खज़ाना बन के आएगा रिश्तों की महफ़िलों मे...
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