दर्द कई किस्म के होते हैँ दर्द कई किस्म होते हैं कुछ जुबां की गिरफ्त में बयान के दायरों में बंधे लबों से रास्ता ढूंढते हुए बाहर छलांग लगाते हुए दर्द और कई दर्द ऐसे जो किसी जुबां के मौताज नहीं होते जो दुनिया झांकते हैं कभी आँखों की खिड़कियों से तो कभी जिस्म की दीवारों से पर लबों से नहीं, जुबां से नहीं ये दर्द कम दर्द देते हैं इन की पहुँच बहुत दूर की होती है जहां चाहें, जिस तक चाहें, पहुँच ही जाते हैं आवारा, बद-चलन, बे-हद इन्हें महसूस कर के भी, ज़हन हल्का रहता है लबों पर हँसी रहती है ये दर्द बद-चलन बे-हद ज़रूर हैं पर, बेबसी नहीं देती और वोह दर्द, जो जुबां की गिरफ्त में बयान के दायरों बंधे होते हैं कम्बखत बहुत दर्द देते हैं रूह-ए-क़त्ल की कला इन्हें ही मालूम है ये बाहर आते हैं तो लबों से चीखें बन कर होठों से सिसकियाँ बन कर और साथ कुछ आंसू भी ले आते हैं इन्हें बयान करने में ...
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